उराँव लोक-नृत्य

उराँव लोक-नृत्य

Glorious Pillar of Indian Society : Uraon Tribe

भारतीय समाज का गौरवशाली स्तम्भ : उराँव जनजाति 

      आज सम्पूर्ण देश में प्रायः सभी तथाकथित प्रगतिशील, कम्युनिस्ट व आधुनिक पृष्ठभूमि के नृतत्वशास्त्रीय शोधकर्ता, कतिपय पूर्ववर्ती ईसाई मिशनरियों के पूर्वाग्रह-ग्रस्त आलेखों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव में आकर मानो एक स्वर से यह निष्कर्ष प्रस्थापित करने में लगे हुए हैं की भारतवर्ष की समस्त जनजातियाँ कदापि हिन्दू नहीं हैं और इन  जनजातियों के नाम, इतिहास, भाषा, पूजन-पद्धति, लोकाचारों, पर्वों-उत्सवों, नृत्य-गीतों एवं गीतों एवं लोक-कथाओं के समेकित अध्ययन से प्राप्त सारभूत निष्कर्ष यह है कि इन्हें हिन्दू से इतर, कदाचित जीववादी या प्रकृतिपूजक कहना मानो अधिक उपयुक्त है। 
          दूसरी ओर यह देखने को मिलता है कि आधुनिक शिक्षा एवं आधुनिकता के भीषण संक्रमण के कारण मौलिक   जनजातिय जीवन-तत्वों को काफी हद तक विस्मृत एवं विलोपित कर देने के बावजूद आज भी अनेक जनजातियाँ अनेकानेक पद्धति से अपने हिन्दू होने सम्बन्धी घोषणा व व्यवहार करती हैं। झारखण्ड से प्रकाशित होने वाले प्रायः समाचार-पत्रों में इस आशय के पत्र अक्सर छपते हैं। परन्तु इस दृष्टि से पूर्वाग्रह-मुक्त होकर इनके सर्वांगपूर्ण नृतात्विक  अध्ययन एवं समुचित विवेचन करने की नितांत आवश्यकता है।

(उराँव जनजाति का विस्तार-क्षेत्र)

सम्प्रति, भारत की एक प्रमुख जनजाति - 'उराँव' से सम्बंधित अध्ययन यहाँ प्रस्तुत है।

विषय-प्रवेश
झारखण्ड प्रान्त स्थित वर्त्तमान छोटानागपुर-संथाल परगना का पठार भारत की विविध वनवासी जातियों का प्रमुख निवास-स्थान है। झारखण्ड की 32 अनुसूचित जनजातियों में एक प्रमुख वनवासी जनजाति है - उराँव, जो मुख्या रूप से झारखण्ड के राँची, गुमला, लोहरदगा, पलामू आदि जिलों के साथ-साथ मध्यप्रदेश के जशपुर, सुरगुजा व गंगापुर के निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करती है। विरल रूप से यह जाति बिहार के शाहाबाद (रोहतास), चम्पारण, दरभंगा, भागलपुर, सहरसा, पूर्णिया और झारखण्ड के संथाल-परगना, हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद एवं सिंहभूम जिलों तथा बंगाल, मध्यप्रदेश और ओड़ीसा के संपूर्ण निकटवर्ती क्षेत्रों में पायी जाती है। इसके अतिरिक्त उरावों की एक बड़ी जनसंख्या अंदमान-निकोबार में एवं असम के चाय बागानों में भी निवास करती है। यह जाति भारत के संपूर्ण कटिवर्ती क्षेत्र में फैली देश की एकमात्र तथा संथालों व गोंड़ों के बाद देश की तीसरी सबसे अधिक जनसंख्या वाली जाति है।

उराँव  जनजाति : जातिगत नाम

उराँव जनजाति, प्रायः अपने तीन परम्परागत जाति-नामों से जानी जाती है -
(1) कुडुख, (2) उराँव एवं (3) उरगन ठाकुर।
आईये, सबसे पहले हम विभिन्न नृतत्ववैज्ञानिकों तथा प्रचलित लोककथाओं की दृष्टि से इन नामों की विवेचना करें।

कुडुख  - शब्दोत्पत्ति

उराँव जनजाति अपनी भाषा में स्वयं को 'कुडुख' पुकारती है। सामान्यतः इस शब्द की व्युत्पत्ति उराँव जाती के दंतकथागत राजनायक 'करुष' से हुई है, जो उराँवों  के पूर्व निवास स्थान 'करुष' (पूर्व शाहाबाद जिला) का संस्थापक रहा है। विद्वानों का मत है कि कालांतर में यह प्रदेश ही 'कीकट' या 'मगध' कहलाया।
यह मान्यता है की उराँव जाति कर्नाटक मूल की जाति है और इसकी भाषा मूल कन्नड़ से मिलती है। (Ref. 1) अतएव, श्री शरदचन्द्र राय ने तिन्नेवेली के निकट ताम्रपर्णी नदी के किनारे स्थित एक गाँव 'कोरकई' से 'कुडुख' शब्द की व्युत्पत्ति को अत्यंत युक्तिसंगत ढंग से जोड़ा है। (Ref. 2)
श्री शरदचन्द्र राय ने एक और सूत्र दिया है। उनके अनुसार 'कुडुख' शब्द मूलतः दक्षिण भारतीय है, जिसका अर्थ है - 'मनुष्य'। संभव है मानव जाति के आद्यपुरुष 'मनु' से 'मनुष्य' एवं हिब्रू मूल के 'आदम' से जिस तरह 'आदमी' शब्दों की व्युत्पत्ति हुई, उसी प्रकार उराँव जाति अपने सहजस्वीकृत दंतकथागत राजपुरुष 'करुष' को  ही अपने मनुष्यवाचक शब्द 'कुडुख' की उत्पत्ति का कारणभूत आदिपूर्वज मानती हो।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार, पुराणपुरुष मनु वैवस्वत के छठे पुत्र 'करुष' ने भारत के मध्यपूर्वी प्रान्तों में अपने राज्य की स्थापना की थी। महाभारत में 'करुष' देश का उल्लेख मिलता है (Ref. 3) एवं प्रत्यक्ष युद्ध में भी  'करुष' जाति का नाम आता है। इस जाति ने कौरवों का साथ दिया था तथा संजय ने धृतराष्ट्र से अपनी ओर की सेनाओं के वर्णन के क्रम में 'करुष' जाति का नाम लिया है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, मूल संस्कृत भाषा का धातु 'कृष' (हल चलाना) - इस शब्द की व्युत्पत्ति का कारण हो सकता है। मूर्धा से बोले जाने वाले अक्षर 'ष' को आमतौर पर 'ख' उच्चारित किया जाता है। इस प्रकार 'कृष' शब्द के, कालान्तर में विकृत होकर 'कृख' या 'कुरूख' होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसका सीधा अर्थ मूल रूप से 'कृषक जाति' ही हो सकता है।
इनके अतिरिक्त कई और मान्यताएँ भी विभिन्न नृतत्ववैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत की गयी हैं, परन्तु वे इस सन्दर्भ में उल्लेख्य व उपयुक्त प्रतीत नहीं होती।

उराँव - शब्दोत्पत्ति

उराँव जाति का दूसरा सुविख्यात नाम 'उराँव' है। कई लोग इसे 'ओराँव' भी लिखते-कहते हैं, परन्तु यह शब्द-प्रयोग गलत है।
इस नाम-शब्द की उत्पत्ति की एक दंतकथा मिलती है। यह इस प्रकार है (Ref. 4) - "काफी समय पूर्व, एक तपस्वी मुनि किसी जंगल में तपस्या करने बैठे। दिन, मास व वर्षानुवर्षों के पश्चात् बिना नींद या भूख-प्यास के एवं बिना हिले-डुले बैठे रहने के कारण उनके चारों ओर दीमक की ऊँची-ऊँची बांबी बन गयी और उसके बाहर चारों ओर कंटीली झाड़ी उग आई। उसका एक लम्बा कांटा उनकी छाती को बेध कर पार हो गया। कालान्तर में एक लकडहारा आया और मुनि को दीमक की बांबी से ढँका एक ठूंठ (पेड़) समझकर उसके ऊपर की मिटटी झाड़ने की इच्छा से उसने अपनी कुल्हाड़ी के दूसरे बट्ट से उस बांबी को मारा।
पर वहाँ तो जीवित आदमी था। मुनि का ध्यान टूट गया और वे अपने पैरों पर खड़े हो गये। खड़े होने के क्रम में उनके ह्रदय में चुभा कांटा टूट गया और उनकी छाती ('उर') से खून चूने लगा। मुनि ने उस खून की एक बूँद भी धरती के ऊपर नहीं गिरने देने की इच्छा से उसे अपनी हथेली पर ले लिया। फिर उन्होंने 'कोरकोट्टा' के पत्तों से एक दोना बनाया और अपना गिर हुआ खून उसमे रखकर उसे बगल के एक छायादार स्थान पर रख दिया।
भविष्य में जब मुनि उस स्थान को छोड़ कर जाने लगे तो उस खून में से दो 'भैया-बहन' प्रकट हुए और यह कहते हुए मुनि से रुकने का आग्रह करने लगे - 'आपने ही हमें जग में लाया है। अब आप हमें छोड़कर चले जाएँगे तो हम कैसे रहेंगे?' मुनि ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा - 'तुमलोग कृषक होओगे। अतएव इन जंगलों को साफ करो और खेती को अपनी जीविका बनाओ। तुम्हारे भण्डार अनाज से भरे रहेंगे और तुमलोग दूसरों को भी हमेशा उसमे से एक मुट्ठी अनाज दे सकोगे।' तभी से वे भैया-बहिन इन उराँवों के प्रथम पुरखे हुए। और चूँकि उनका जन्मा उस मुनि के ह्रदय (संस्कृत शब्द 'उर') से निकले रक्त से हुआ, अतः वे और उनके वंशज 'उरगन ठाकुर' या 'उराँव' कहलाये।
उन दिनों ये 'उरगन ठाकुर' भी पवित्र यज्ञोपवीत धारण करते थे और किसी भी तरह ब्राह्मणों से कम सम्मानित नहीं माने जाते थे परन्तु समय के साथ जब इन्होंने अपना श्रेष्ठ स्थान छोड़कर, जो भी मिला, उसे खाने-पीने लगे, तब से ये 'उरगन ठाकुर' के बजाय सिर्फ 'उराँव' कहलाने लगे।"
यहाँ इस  उराँव-गाथा की तुलना 'यम-यमी' नामक भाई-बहन की प्रसिद्द हिन्दू पौराणिक कथा से अथवा रामायण में वर्णित बालि व सुग्रीव की जन्म-कथा (Ref. 5) से की जा सकती है।
यहाँ एक विषय और भी ध्यातव्य है। वह है, मूल सृजनकर्ता के उर से जन्म लेने के कारण (कदाचित क्षत्रिय भाव में) 'उरगन ठाकुर' होने की मान्यता, तथा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के चारो अंगों से हिन्दू मान्यतानुसार चारो वर्णों की उत्पत्ति एवं उनमे से छाती से ही क्षत्रिय की उत्पत्ति की कथा में कैसा अदभुत साम्य है।

उरगन ठाकुर - शब्दोत्पत्ति

उराँव जाति के लिए यह नाम न केवल स्वयंस्वीकृत है, अपितु अनेक विशेषज्ञों ने भी इसे स्वीकार करते हुए इसका बारम्बार उल्लेख किया है।
श्री महावीर वर्मा  (Ref. 6), श्री योगेश्वर पाण्डेय  (Ref. 7), श्री शरद चन्द्र राय  (Ref. 8)एवं श्री बोनीफेस तिर्की (Ref. 9) प्रभृति लेखकों ने अपने शोध प्रबंधों में स्वाभाविक रूप से कई बार इस शब्द का प्रयोग किया है।
उराँवों के सामाजिक संगठन 'पड़हा' के व्यवस्था नियमन से सम्बंधित एक पुस्तक में लिखा है (Ref. 10)- "हम आरम्भ में उरगन ठाकुर कहलाते थे। वर्तमान काल में भी जहाँ-तहाँ हम उरगन ठाकुर ही कहलाते हैं।"
पता नहीं क्यों, ईसाई मिशन से जुड़े प्रायः लेखक-शोधकर्ता उराँव जाति के सन्दर्भ में उनके इस जातिगत नाम के उल्लेख से परहेज करते आये हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि रामायण काल में श्रीरामजी के सहायतार्थ सुग्रीव ने वानर मुखियों को बुलावा भेजा था। श्री शान्तिकुमार नानूराम व्यास ने लिखा है (Ref. 11)- "वे आर्य प्रदेशों के पूर्व और उत्तर में निवास करने वाले आदिवासी राजा थे। वानरों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व था और उनका समाज 'हरिगण' के नाम से ख्यात था। 'हरि' शब्द वानर का ही पर्यायवाची है। हरिगण की तीन शाखाएं थी - ऋक्ष, गोलांगूल और वानर। सामान्य धारणा के विपरीत ऋक्ष लोग भालू नहीं थे, वरन ऋक्ष पर्वत पर निवास करने वाले हरिगण थे।"
उल्लिखित सन्दर्भ में 'हरिगण' की तुलना 'उरगन' से की जा सकती है। स्पष्ट है कि श्रीरामजी की सेना के प्रमुखतम अंग 'वानर' ही आज के उराँव हैं। 'आदिवासी पड़हा डहरे' में उल्लेख भी है (Ref. 12)- " रामचन्द्रजी की सेना में हमारी ही संख्या अधिक थी।"

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REFERENCES:
1. Encyclopedia Britannica, 11th Edition, Vol.5, Page 361 & 'Early History of India', - Vincent Smith, page 173.
2. 'The Oraons of Chotanagpur', -Sharad Chandra Roy, Page 10.
3. महाभारत - 1/7/67/64.
4. 'The Oraons of Chotanagpur', -Sharad Chandra Roy, Page 16.
5. बाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड, 42/7-12 एवं अध्यात्म रामायण, उत्तर काण्ड, 3/1-14.
6. 'कोयल के किनारे-किनारे', - महावीर वर्मा, पृष्ठ 44-46.
7. 'वंशदर्पण - जाति भेद', - योगेश्वर पाण्डेय, पृष्ठ 71-72.
8. 'The Oraons of Chotanagpur', -Sharad Chandra Roy, Page 16.
9. 'The Smiling Oraon', - Boniface Tirky, Page 4.
10. 'आदिवासी पड़हा डहरे', - प्रकाशक - आदिवासी राजी पड़हा, गुमला, पृष्ठ 10.
11. 'रामायणकालीन समाज', - शान्तिकुमार नानूराम व्यास, पृष्ठ 57.
12. 'आदिवासी पड़हा डहरे', प्रकाशक - आदिवासी राजी पड़हा, गुमला, पृष्ठ 10.

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